मृदा प्रदूषण से मुकाबला : फाइटोरेमेडिएशन तकनीक बनी पर्यावरण संरक्षण का सरल व प्रभावी उपाय,

तीव्र औद्योगीकरण, खनन और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण मृदा प्रदूषण आज एक वैश्विक पर्यावरणीय संकट का रूप ले चुका है। कैडमियम, सीसा, पारा, आर्सेनिक और क्रोमियम जैसी भारी धातुएं मृदा में जमा होकर लंबे समय तक बनी रहती हैं, जो न केवल फसलों की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं, बल्कि खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन विषैले तत्वों के लगातार संपर्क में आने से कैंसर, तंत्रिका तंत्र की क्षति और अंग दुर्बलता जैसी समस्याओं का बढ़ता जोखिम सामने आता है। बच्चों के लिए यह खतरा और भी गंभीर है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए पर्यावरणीय विद्वानों द्वारा सुझाई गई फाइटोरेमेडिएशन तकनीक तेजी से चर्चा में है, जिसे दूषित मृदा और जल में मौजूद भारी धातुओं को हटाने या निष्क्रिय करने के लिए पौधों के उपयोग पर आधारित एक हरित, किफायती और सरल उपाय माना जाता है। इस तकनीक में पौधे जड़ों के माध्यम से धातुओं को अवशोषित कर उन्हें पत्तियों में जमा कर लेते हैं। सूरजमुखी जैसे पौधे इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
फाइटोरेमेडिएशन की प्रमुख विधियों में फाइटोएक्सट्रैक्शन, जिसमें पौधे धातुओं को सोखकर अपने ऊतकों में जमा करते हैं, तथा फाइटोस्टेबिलाइज़ेशन, जिसमें पौधे प्रदूषकों की गतिशीलता को कम कर उनके फैलाव को रोकते हैं, शामिल हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि कार्बनिक संशोधनों — जैसे बायोचार और कम्पोस्ट — को इस तकनीक के साथ जोड़कर मृदा की संरचना, उर्वरकता और पौधों की वृद्धि में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है। इससे प्रदूषकों के अवशोषण की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है।
इस विषय पर विस्तृत अध्ययन कर रहे राजीव कौशिक, पीएचडी शोधार्थी, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी (जन्मस्थली: तारापुर, मुंगेर, बिहार; कर्मभूमि: दक्षिणी दिल्ली) बताते हैं कि फाइटोरेमेडिएशन न केवल भारी धातु प्रदूषण से निपटने का प्रभावी तरीका है, बल्कि यह कम लागत वाला, पर्यावरण-अनुकूल तथा ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से अपनाया जाने वाला समाधान भी है। उनके अनुसार, “फाइटोरेमेडिएशन तकनीक न सिर्फ मृदा की गुणवत्ता को बहाल करती है, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए तो देश में खाद्य सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और सार्वजनिक स्वास्थ्य—तीनों क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं। सरकार और स्थानीय निकायों द्वारा जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देने से मृदा प्रदूषण को नियंत्रित करने के प्रयास और अधिक प्रभावी बन सकते हैं।




