
मुंगेर ज़िले के हवेली खड़गपुर में जन्मे विश्वविख्यात चित्रकार नंदलाल बोस की जयंती आज कला-प्रेमियों को उनकी महान विरासत की याद दिलाती है। 3 दिसम्बर 1882 को जन्मे नंदलाल बोस न केवल भारतीय कला के शिखर पुरुष माने जाते हैं, बल्कि उन्होंने भारतीय संविधान की मूल प्रति को 22 अनूठे चित्रों से सजाकर देश की सांस्कृतिक पहचान को नई ऊंचाइयाँ दीं। इन चित्रों को पूर्ण करने में उन्हें लगभग चार वर्ष लगे। यही नहीं, उन्होंने भारत रत्न और पद्मश्री जैसे राष्ट्रीय सम्मानों के प्रतीक चिह्न भी तैयार किए।
उनके पिता पूर्णचंद्र बोस महाराजा दरभंगा की रियासत के मैनेजर और एक आर्किटेक्ट थे, जबकि कला की प्रारंभिक प्रेरणा उन्हें अपनी माँ क्षेत्रमणि देवी से मिली। बचपन से ही पढ़ाई की अपेक्षा उनका रुझान चित्रकारी में रहा। अंततः उन्हें कला विद्यालय भेजा गया, जहाँ उन्होंने पाँच वर्षों तक औपचारिक कला शिक्षा ली। बाद में वे अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के शिष्य बने और 1922 से 1951 तक शांतिनिकेतन के कला-भवन के प्रधानाध्यापक रहे।
हवेली खड़गपुर से शुरू हुई कला यात्रा
नंदलाल बोस के बचपन की कला-चेतना यहीं हवेली खड़गपुर की मिट्टी में विकसित हुई। स्थानीय कुम्हार उनके पहले गुरु थे। बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करने के बाद भी वे अपनी जन्मभूमि से जुड़े रहे। वे राजगीर व भीमबांध की पहाड़ियों में छात्रों के साथ अध्ययन-भ्रमण हेतु आते रहे। खेद की बात है कि राज्य स्तर पर आज तक उनकी स्मृतियों के संरक्षण के लिए कोई ठोस पहल नहीं हुई है।
अंतरराष्ट्रीय कला समूह का हिस्सा
अजंता के भित्ति चित्रों से प्रभावित होकर वे भारतीय संस्कृति को पुनर्जीवित करने वाले अंतरराष्ट्रीय कला समूह का हिस्सा बने। इस समूह में ओकाकुरा ककुजो, विलियम रोथेन्स्तीं, अबनिन्द्रनाथ टैगोर, एरिक गिल जैसे प्रसिद्ध कलाकार और समीक्षक शामिल थे। उनकी प्रतिभा को गगनेन्द्रनाथ टैगोर, आनंद कुमारस्वामी और ओ.सी. गांगुली ने विशेष सराहना दी।
नेशनल गैलरी में संग्रहीत 7000 कृतियाँ
नई दिल्ली स्थित नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में नंदलाल बोस की लगभग 7000 कृतियाँ संग्रहित हैं, जिनमें दांडी यात्रा के दौरान बनाए गए महात्मा गांधी के प्रसिद्ध लिनोकट और कांग्रेस के 1938 के हरिपुरा अधिवेशन के लिए बनाए गए सात ऐतिहासिक पोस्टर शामिल हैं। उनकी चित्रकारी ने उस दौर के आंदोलनों और सामाजिक रूपांतरणों को अद्भुत शैली में उकेरा।
खड़गपुर की शान : उनकी स्मृतियाँ आज भी जीवंत
हवेली खड़गपुर के लोग स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं कि विश्व-पटल पर कला का चमत्कार फैलाने वाले नंदलाल बोस का जन्म यहीं हुआ। उनके सम्मान में खड़गपुर हॉट चौक पर उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है। इस कार्य का श्रेय संभवा साहित्य मंच के संस्थापक तथा सेवानिवृत्त प्रशासनिक पदाधिकारी ध्रुव नारायण गुप्ता को जाता है।
प्रत्येक वर्ष उनकी जयंती पर नगर पंचायत कार्यालय, विद्यालयों, सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों और कला-प्रेमियों द्वारा कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। नंदलाल बोस की कृतियाँ आज भी आने वाली पीढ़ियों को भारतीय कला की गौरवशाली परंपरा से जोड़ती हैं।
आज उनकी जयंती पर खड़गपुर वासी गर्व के साथ स्मरण करते हैं—
कि इस मिट्टी ने विश्व कला को एक अमर रत्न दिया।




